श्मशानी ज्ञान : भाग-1/2 (एक लेख)

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ममता, मोह, लगाव, माया से दूर होना, जनसेवा आदि सत्कर्म करना वगैरह वगैरह जो समाजहित के या अध्यात्म सम्मत काम हैं। इनका औचित्य मानव को तब अधिक याद आता है जब वह श्मशान में गया हो, किसी मुर्दे की अन्त्येष्टि के लिए तथा लोगों के साथ बैठकर बातें कर रहा हो। लेकिन जैसे ही वहाँ से रवाना हुए और श्मशान घाट की सीमा से बाहर निकले कि उस ज्ञान को त्याग कर अपनी प्रतिदिन की आपाधापी की योजनाएं शुरू। शायद इसीलिए इसे श्मशानी ज्ञान कहा जाता हो।

मैं इसे मेरी अपनी सोच से और आजकल “कोरोना महामारी” के डर से जो भगदड़ मची हुई है, उसके अनुसार देखता हूँ कि मानव अपने जन्म से मृत्यु तक अलग अलग आयुकाल में अलग अलग प्रकार से और अलग अलग चीजों से लगाव रखता है और जीर्णशीर्ण अवस्था में जब करीब करीब सभी तरफ से तिरस्कार पाता है तो “अंतिम लगाव” इस “सृष्टि के निर्माता-नियन्त्रक” के साथ स्थापित करने का प्रयास करता है। देखिए कैसे ?

मानव अपने जन्म से लेकर एक दो साल का होता है तब तक उसका लगाव केवल उसकी माँ से या जो उसकी उदरपूर्ति करवाये और लाड़-प्यार से खेलाता रहे जैसे दादा-दादी या नाना-नानी या और कोई भी जो उसका ध्यान रखे उससे होता है। शेष बातों से और दुनियाँ से उसे कोई लगाव नहीँ होता है। लेकिन थोड़ा और बड़ा होने के साथ जब वह भय से भी परिचित हो जाता है, लगभग दस वर्ष का होने तक तो उसका लगाव, अब उसके साथ खेलने वाले मित्रों से, उसके खाने-पीने-सोने की व्यवस्था करने और भय से सुरक्षा करने वालों के साथ हो जाता है। शेष पेज नं. 2 पर …

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