Prajapati jati ka itihaas || प्रजापति जाति का इतिहास || Indian History || Our Culture || History of Prajapati Kumhar Caste

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prajapati jati ka itihaas

कुम्हार को कैसे मिली प्रजापति की उपाधि

कुम्हार एक समाज है जबकि प्रजापति (prajapati) उन्हें दी गई एक उपाधि है। कुम्हार प्रजापति कब से कहलाने लगे। इस सम्बन्ध में कई दंत कथायें प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार प्रजापति ब्रह्मा ने एक यज्ञ किया।  जिसमें उन्होंने सभी जाति के लोगों को बुलाया और उन्हें गन्ना वितरित किया। जब ब्रह्मा जी को वहाँ कुम्हार नजर नहीं आया तो उन्होंने पुछा कि कुम्हार क्यों नहीं आया। तो महर्षि नारद ने कहा कि भगवन वह अपने कार्य में व्यस्त होगा। इसलिये नहीं आ सका।

तब ब्रह्मा जी ने नारद जी को उनका गन्ना वहीं देकर आने को कहा। नारद जब कुम्हार के घर पहुँचे तो वह बर्तन बनाने में व्यस्त था। नारद ने कहा कि ब्रह्मा जी ने तुम्हारे लिये गन्ना भेजा है। इस पर कुम्हार ने कार्य करते हुए कहा कि उस कोने में चाक के पास रख दो। नारद जी गन्ना रखकर चले गए। कुम्हार भी अपने कार्य बर्तन आदि बनाने में व्यस्त रहा है।

कुछ दिनों के अंतराल में ब्रह्मा जी ने सभी जाति के लोगों को फिर बुलाया और अपना दिया हुआ गन्ना वापस मांगा। इस पर सभी ने कहा कि हम तो आपका दिया हुआ गन्नाउसी समय खा गये थे। इस पर ब्रह्मा जी बोले की वह गन्ना मुझे चाहिए। जिसके भी पास मिले वह मुझे लाकर दो। 

इस पर नारद जी बोले कि हमें कुम्हार के घर चलना चाहिए वहाँ गन्ना हो सकता है। जब सभी लोग कुम्हार के घर गए तो वह उसी तरह भगवान का भजन करते हुए बर्तन बनाने के कार्य में व्यस्त था। नारद जी ने कुम्हार से गन्ने के बारे में पुछा तो उसने कहा कि जहाँ आप रख गये थे वहीं होगा। 

कुम्हार ने वहां जाकर देखा तो गन्ना अंकुरित होकर पौधा बन गया था। जिसमें बहुत सारी नई कौंपले निकल गई थी।  यह देखकर कुम्हार ने कहा कि भगवान से पूछो उन्हें कितने गन्ने चाहिए। यहाँ तो बहुत सारे गन्ने है।  यह सुनकर सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए तथा ब्रह्मा जी के पास जाकर उन्हें यह वृतान्त बताया। 

यह सुनकर ब्रह्माजी बोले कि अब मेरी प्रतिज्ञा पुरी हुई। कुम्हार के पास गन्ना मिल गया। कुम्हार की काम के प्रति निष्ठा देख ब्रह्मा जी ने उसे प्रजापति की उपाधि से पुरस्कृत किया। इस प्रकार कुम्हार समाज (prajapati samaj) अपने नाम के साथ प्रजापति लगाने लगा।

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प्रजापति कौन है?

आज भी होती है कुम्हार के चाक की पूजा

कुम्हार समाज (kumhar samaj) के घर पर आज भी चाक की पूजा होती है। सदियों से यह प्रथा चली आ रही है कि जब भी घर में कोई धार्मिक आयोजन जैसे – शादी विवाह आदि होता है तो महिलाओं के द्वारा चाक की पूजा की जाती है तथा मंगल कलश लाये जाते है। 

जब महिलायें कुम्हर (kumhar) के घर मंगल कलश बासन लेने जाती है तो वे पहले चाक की पूजा करती है। उसके बाद मंगल कलश की पूजा की जाती है। जब वे महिलायें मंगल कलश घर लेकर आती है तो घर के मुख्य दरवाजे के बाहर भी उनका पूजन किया जाता है।

कलशयात्रा, मंगल कलश और कुम्हार

आज भी धार्मिक आयोजनों में कलश यात्रा का विशेष महत्व है। आज भी कलशयात्रा में मिट्‌टी के कलश व बासन का प्रयोग किया जाता है। उनमें कुएं और नदी का पवित्र जल भरकर लाया जाता है जिसे गंगाजल के समान पवित्र माना जाता है। कलशयात्रा का आयोजन शादी-विवाह के अवसर पर भी आवश्यक रूप से किया जाता है। सभी समाजों के द्वारा पूर्ण आस्था और विस्वास के साथ कलश की पूजा की जाती है।

प्राचीन स्मृतियों में एक श्लोक है –

शिल्पिन: स्वर्णकारश्च दारूक: कांस्यकार:।

काडूक: कुम्भकारश्च प्रकृत्या उत्तमाश्चषट्।।

इसका अर्थ है कि शिल्पकार, सोना बनाने वाले स्वर्णकार, बढ़ई, कांसी को बनाने वाले, रूपकार और कुम्भकार (कुम्हार) (kumhar samaj) यह प्रकृति से उत्तम होते है। अर्थात यह शिल्पी जातियां जन्म या स्वभाव से उत्तम जाति है।