क्या आप जानते है कि देवकी और वसुदेव पिछले जन्म में प्रजापति थे?

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image sourse pinterest से साभार।

क्या आप जानते है कि देवकी और वसुदेव पिछले जन्म में प्रजापति थे?

प्राचीन वैदिक साहित्य में प्रजापति शब्द का अनेक स्थानों पर प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ सृष्टि के निर्माता प्रजापति ब्रह्मा से लगाया जाता है। प्रजापति शब्द का सामान्य अर्थ – प्रजा का स्वामी, नायक, प्रमुख या राजा से भी लगाया जाता रहा है। अब नाम की बात करें तो सर्वप्रथम इसकी उपाधि राजा दक्ष को दी गयी थी जो दक्ष प्रजापति के नाम से विख्यात हुए। भगवान विश्वकर्मा तथा उनके पुत्रों केे लिए भी प्रजापति का प्रयाेग विश्वकर्मा पुराण में मिलता है। कालांतर में भारतवर्ष में ये नाम एक समुदाय या जाति के द्वारा भी प्रयोग किया जाने लगा है। यहाँ सतरूपा के साथ प्रयोग किया गया प्रजापति शब्द किस अर्थ का द्योतक है। यह एक विचारणीय प्रश्न है।

देवकी और वसुदेव अपने पिछले जन्मों में प्रजापति थे। जिनका नाम सुतपा था और उनकी पत्नी पृश्नि थी। जिन्होंने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या कर उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त करने का वरदान प्राप्त किया। भगवान श्री हरि ने स्वयं प्रकट होकर दर्शन दिये तथा वरदान दिया कि वे उन्हें तीन जन्मों तक पुत्र रूप में प्राप्त करेंगे। भगवान विष्णु कहते है कि प्रथम जन्म में मेरा नाम पृश्निगर्भ था। अगले कल्प में आपने अदिति और कश्यप के रूप में जन्म लिया तथा उपेन्द्र नाम से आपका पुत्र बना। जिसमें मेरा स्वरूप बौने जैसा होने के कारण में वामनदेव के नाम से विख्यात हुआ । अब तीसरी बार में देवकी तथा वासुदेव से कृष्ण नाम से उत्पन्न हुआ हुँ।

साथियों यह मै अपनी तरफ से जोड़ कर नहीं कह रहा हूँ। इसका वर्णन भक्तिवेदान्त बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित लीला पुरूषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण नाम पुस्तक में किया गया है। इस पुस्तक के लेखक श्री श्रीमद् अभयचरणारविन्द भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद है। इस पुस्तक के पेज नंबर 33, 34 व 35 पर इस यह वृतान्त है।

इस पुस्तक में वर्णन किया गया है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया तथा जन्म लेने के बाद उन्होंने देवकी और वसुदेव को अपने चतुर्भुज रूप में दर्शन दिये। जिसके पश्चात देवकी कंस के भय से डर कर भगवान से पश्न करती है कि – मुझे ज्ञात है कि आपके इस दिव्य स्वरूप का दर्शन सामान्यतया ऋषिगण ध्यान में करते है, किन्तु में अभी भी डर रही हूँ कि ज्योंही कंस को पता चल जाएगा कि आपका जन्म हो चुका है, तो वह आपको हानि पहुँचा सकता है। अत: मेरी प्रार्थना है कि आप इस समय हमारे भौतिक चक्षुओं से ओझल हो जाँए।

दुसरे शब्दों में, उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि वे एक सामान्य बालक का रूप धारण कर लें। आपके जन्म के कारण ही मैं अपने भाई कंस से भयभीत हूँ। हे मधुसूदन! हो सकता है कि कंस को पता न लगे कि आपने जन्म धारण कर लिया है। अत: मेरी प्रार्थना है कि आप अपने इस चतुर्भुज रूप को, जिसमें आप विष्णु के चार चिन्ह शंख, चक्र, गदा तथा कमल धारण किये है, छिपा लें। हे प्रभु! आप दृश्य जगत के प्रलय के अन्त में सारे ब्रह्माण्ड को अपने उदर में धारण करते है फिर भी आप अपनी विशुद्ध कृपावश मेरे गर्भ में प्रकट हुए है। मुझे आश्चर्य है कि आप अपने भक्तों को प्रसन्न करने के लिए सामान्य मनुष्य के कार्यकलापों का अनुकरण करते है।

देवकी की प्रार्थना सुनकर भगवान ने उत्तर दिया, – हे माता! स्वायंभुव मनु के कल्प में मेरे पिता वसुदेव एक प्रजापति के रूप में थे जिसका नाम सुतपा था और आप उनकी पत्नी पृश्नि थी। उस समय ब्रह्मा ने प्रजा बढ़ाने की इच्छा से आपसे संतान उत्पन्न करने के लिए कहा। आपने अपनी इन्द्रियों को वश में करते हुए कठोर तपस्या की। योग-पद्धति में प्राणायाम का अभ्यास करते हुए आप पति-पत्नी दोनों ने वर्षो, वायु, कड़कती धूप जैसे भौतिक नियमों के सारे प्रभावों को सहन किया। आपने समस्त धार्मिक नियमों का भी पालन किया। इस प्रकार आपका ह्दय निर्मल हो गया और भौतिक नियमों के प्रभावों पर भी नियंत्रण प्राप्त हो गया।

तपस्या करते हुए आप वृक्षों के नीचे भूमि पर गिरी हुई पत्तियों मात्र का आहार करती रहीं। तब स्थितर मन तथा इन्द्रिय निग्रह द्वारा आपने मुझसे अद्भुत वर प्राप्त करने के लिए मेरी पूजा की। आप दोनों ने देवताओं की गणना के अनुसार 12,000 वर्षो तक कठोर तपस्या की। उस अवधि में आपका मन मुझमें ही लीन रहा। जब आप भक्ति कर रही थी और अपने मन में निरन्तर मेरा ध्यान कर रहीं थी, तब मैं आपसे अत्यधिक प्रसन्न हुआ। हे निष्पाप माता ! अत: आपका अन्त:करण नित्य ही विशुद्ध है।

उस समय भी मै आपके समक्ष इसी रूप में आपकी इच्छापूर्ति के लिए प्रकट हुआ था और आपसे मनवांछित वर माँगने के लिए कहा था। उस समय आपने चाहा था कि मै आपके पुत्र रूप में जन्म लूँ। यद्यपि आपने मेरा साक्षात् दर्शन किया था, तथापि आपने मेरी माया के प्रभाव के कारण व्यापक भवबंधन से पूर्ण मुक्ति न माँग कर मुझे अपने पुत्र के रूप में माँगा था।

दुसरे शब्दों में, भगवान ने प्रकट होने के लिए इस जगत में पृश्नि तथा सुतपा को अपने माता-पिता के रूप में चुना। जब भी भगवान् मनुष्य रूप में अवतरित होते है, उन्हें माता-पिता की आवश्यकता होती है; फलत: उन्होंने पृश्नि और सुतपा को शाश्वत माता-पिता के रूप में चुना; इसलिए पृश्नि तथा सुतपा दोनों ही मुक्ति की याचना न कर सके। मुक्ति उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती जितनी कि भगवान की दिव्य प्रेमा-भक्ति होती है।

भगवान् चाहते तो पृश्नि तथा सुतपा को तुरन्त मुक्ति प्रदान कर सकते थे, किन्तु अपने विभिन्न अवतारों के लिए उन्हें इसी भौतिक जगत में बनाये रखना श्रेयस्कर समझा, जैसाकि आगे वर्णन किया जाएगा। भगवान् से उनके माता-पिता बनने का वर प्राप्त करके पृश्नि तथा सुतपा दोनों अपनी तपस्या छोड़कर घर चले आये और पति-पत्नी के रूप में रहने लगे जिससे वे साक्षात् परमेश्वर को पुत्र रूप में उत्पन्न कर सकें।

कालक्रम से पृश्नि गर्भवती हुई और एक शिशु को जन्म दिया। भगवान ने वसुदेव तथा देवकी से कहा – उस समय मेरा नाम पृश्निगर्भ था। अगले कल्प मे आपने अदिति तथा कश्यप के रूप में जन्म लिया और तब में उपेन्द्र नाम से आपका पुत्र बना। उस समय मेरा स्वरूप एक बौने जैसे था जिससे मैं वामनदेव के नाम से विख्यात हुआ। मैने आपको वर दिया था कि मैं तीन बार आपके पुत्र रूप में जन्म धारण करूंगा। पहल बार में पृश्नि तथा सुतपा से जन्म लेकर पृश्निगर्भ कहलाया, दूसरी बार में अदिति तथा कश्यप से जन्म लेकर उपेन्द्र कहलाया और अब तीसरी बार में देवकी तथा वसुदेव से कृष्ण नाम से उत्पन्न हुआ हूँ।

मैं इस विष्णु रूप में इसलिए अवतरित हुआ हूँ कि आपको विश्वास दिला सकूँ कि उसी श्रीभगवान् ने पुन: जन्म धारण किया है। मैं चाहता तो एक सामान्य शिशु के रूप में प्रकट हो सकता था, किन्तु तब आपको विश्वास न होता कि आपके गर्भ से मुझ भगवान ने ही जन्म लिया है। हे मेरे माता-पिता! इस तरह आपने कई बार अत्यन्त लाड़-प्यार से अपने पुत्र के रूप में मुझे पाला-पोसा है, अत: मैं अत्यधिक प्रसन्न हूँ और आपका अत्यन्त कृतज्ञ हूँ।

मै विश्वास दिलाता हूँ कि इस बार आप अपने उद्देश्य को पुरा करके भगवद्धाम को वापस जाएँगे। मैं मानता हूँ कि आप मेरे लिए चिन्ति है और कंस से भयभीत है। अत: मेरो आदेश है कि आप तुरन्त ही मुझे गोकुल ले चलें और यशोदा की नवजात कन्या से जो अभी अभी उत्पन्न हुई है, मुझे बदल लें।

  • लीला पुरूषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण पुस्तक से साभार ।