कुम्हारी कार्य में प्रयुक्त शब्दावली को भुला चुकी है वर्तमान पीढ़ी

कुम्हार की शब्दावली नहीं सांस्कृतिक परंपरा मिट रही है

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कुम्हार की शब्दावली नहीं सांस्कृतिक परंपरा मिट रही है

मित्रों लोकजीवन में जिसे हम प्रजापत के नाम से जानतें है वहीं लोक शास्त्रों में जिसे … ब्रह्म जात कुम्हार की, शंकर जात फकीर की. ….के नाम से जाना जाता है। जिसका सीधा संबंध प्रजा से है। जो मानव जीवन के आरंभ काल से पात्रों को बनाकर उनके विविध स्वरूप प्रदान करता आ रहा है। अथर्ववेद में जिस के बनाए हुए पात्रों को अलाबु पात्रं पात्रं… की संज्ञा प्रदान की गई है । मनु महाराज ने जिसके लिए मनुस्मृति में … जलाबूं दारू पात्रं च मृणमयं वैदल …. आदि शब्दों का प्रयोग किया है। यजुर्वेद में जिसके लिए …. कुलालेम्यःकरमारेभ्यष्चवो नमः… सादर शब्दों का प्रयोग किया गया है।

इतना ही नहीं यजुर्वेद में दूध और घी के भरे हुए घड़ों का जो ब्योरा मिलता है उसके पीछे भी कुम्हार की महानता दिखलाई पड़ती है। इसके साथ ही वैदिक काल में इनके द्वारा बनाए गए बर्तनों भूतभृत, सत, चमस, स्थाली, आधवनीय, अम्भूण, ग्रह आदि बर्तनों के बनाने का ब्यौरा मिलता है। बाल्मीकि रामायण में अनेक स्थलों पर कुम्हार द्वारा बनाए गए घड़ों में अमृत होने का ब्यौरा मिलता है। खबर का शेष अगले पेज पर है …